फिल्म समीक्षा : ’30 मिनट्स’ पर अपना एक मिनट भी न करें बर्बाद

अरे चिंटू ! उड़ते-उड़ते खबर आई है कि ‘बेफिक्रे’ के अलावा इस सप्ताह एक और फिल्म रिलीज़ हुई है. फिल्म का नाम है ’30 मिनट्स’. तो क्या बिना प्रमोशन के रिलीज़ हो रही यह फिल्म देख ली है तुमने? अगर हां, तो जरा बताना कैसी है यह फिल्म ?

फिल्म चाहें छोटी हो या बड़ी, उसे ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचाने के लिए थोड़े बहुत प्रमोशन की अहमियत को कोई नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता. लेकिन यह बात तो मेरी समझ से बिल्कुल परे है कि कैसे ’30 मिनट्स’ के निर्माताओं ने यह सोच लिया कि बिना किसी प्रमोशन के उनकी फिल्म दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचकर लाएगी. प्रमोशन के नाम पर फिल्म के निर्माताओं ने इसके म्यूजिक को अक्षय कुमार द्वारा रिलीज़ करवाने के अलावा कुछ और नहीं किया है. खैर, वह सब भूलकर आइये जानते हैं कि कैसी है यह फिल्म.

कहानी

’30 मिनट्स’ एक साइकॉलोजिकल थ्रिलर है. समय की अहमियत को समझाने के लिए एक बाप छोटी-छोटी बातों के लिए भी अपने बेटे शशांक (हितेन पेंटल) को इस कदर पीटता है कि उस मार का असर उस पर हमेशा बना रहता है. बड़े होकर वह कुछ मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाता है. देखने में किसी भी नार्मल इंसान की तरह लगने वाला शशांक एक कंपनी में कंटेंट राइटर के तौर पर काम करता है. जल्द ही उसे अपने ऑफिस में काम करने वाली शिवांगी (ऋशिता भट्ट) से प्यार हो जाता है. लेकिन अपने बचपन की कड़वी यादों की वजह से वह कई मुसीबतों का शिकार होता रहता है. अपनी इन्ही कड़वी यादों से छुटकारा पाने के लिए वह एक गेम प्लान करता है, जिसका नाम है ’30 मिनट्स.’ अब क्या है यह गेम, उसे जानने के लिए आपको यह फिल्म देखनी होगी.

स्क्रिप्ट और निर्देशन

फिल्म की कहानी लिखी है विवेक मिश्रा ने और डॉयलाग्स लिखे हैं राजन अग्रवाल ने. सस्पेंस-थ्रिलर होने की वजह से फिल्म की टोन वैसे काफ़ी सीरियस है, लेकिन जब आप इसके डॉयलाग्स सुनेंगे तो अपना सर पकड़ कर बैठ जायेंगे. बिना किसी सर-पैर की कहानी में बेमतलब के डॉयलाग्स सुनकर आप आधी फिल्म के बीच में ही उठकर थिएटर से बाहर निकलने के बारे में सोच सकते हैं. अब जिस फिल्म की कहानी ही इतनी कमज़ोर हो उस फिल्म का डायरेक्टर भी उसे डूबने से नहीं बचा सकता. येसुदास बी.सी का निर्देशन औसत दर्ज़े का है.

अभिनय

हितेन पेंटल फिल्म के हीरो हैं, लेकिन हीरो वाली कोई भी बात उनमें दूर-दूर तक नज़र नहीं आती. फिल्म के अधिकतर हिस्से में वह बहुत ही थके हुए नज़र आते हैं. शायद उन पर उम्र अपना असर दिखाने लगी है. बात करें अगर ऋशिता भट्ट की, तो फिल्म में ग्लैमर ऐड करने के अलावा उनका कोई काम नहीं है. साफ़ पता चलता है कि उनका किरदार कमज़ोर राइटिंग का शिकार हुआ है. यही हाल अमूमन फिल्म से जुड़े दूसरे कलाकारों का भी है.

गीत-संगीत

यूं तो फिल्म में कुल मिलाकर चार संगीतकार हैं, लेकिन फिर भी आपके कान एक ढंग का गाना सुनने के लिए तरस जायेंगे. शायद मुझे इससे ज्यादा कुछ और कहने की जरूरत नहीं.

देखें या न देखें

बिना आपका वक़्त गवाएं मैं आपको बताना चाहूंगा कि इस फिल्म पर आपको अपने पैसे खर्च करने की कोई जरूरत नहीं. अगर फिर भी आप ऐसा करते हैं तो फिर ये मत कहियेगा कि अरे चिंटू ने आगाह नहीं किया.

फिल्म का नाम: 30 मिनट्स

अरे चिंटू रेटिंग: 1 स्टार्स

डायरेक्टर: येसुदास बी.सी

कलाकार: हितेन पेंटल, ऋषिता भट्ट, हेमंत पांडेय, राणा जंग बहादुर

संगीत निर्देशक: जसपाल मोनी, नरेश विकल, अशोक शर्मा, हारुन

शैली: सस्पेंस-थ्रिलर

अवधि: 1 घंटा 54 मिनट

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