दर्शक एक बार और देखना चाहते हैं ‘जिला चंपारण’ : मोहिनी घोष

भोजपुरी सिने इंडस्‍ट्री की ग्‍लैमरस ब्‍यूटी मोहिनी घोष इन दिनों बिहार में अपनी फिल्‍म ‘जिला चंपारण’ को प्रमोशन में व्‍यस्‍त हैं। इन्‍होंने कई फिल्‍मों में काम किया है और कई फिल्‍में फ्लोर पर हैं। क्रिटिक्‍स की मानें तो मोहतरमा जितनी खूबसूरत हैं, अभिनय भी उतना ही लाजवाब है। ये रील लाइफ को बखूबी जीती हैं। कहा जाता है कि इन्‍हें अपने किरदार को जीवंत करने की कला में बंगाली छाप दिखता है। अमिताभ बच्‍चन, सलमान खान, माधुरी दीक्षित, पाखी हेगड़े को ये अपना रोल मॉडल मानती हैं। खैर आईये अब मोहिनी से ही जानते हैं उनके बारे में और उनकी फिल्‍म के बारे में।

सवाल : बंगाल की फिल्‍म इंडस्‍ट्री काफी समृद्ध है, फिर भी भोजपुरी। क्‍यों ?

जवाब : मुझे भोजपुरी अपनी भाषा लगती है। इसमें मैं खुद को फिट पाती हूं। सच कहूं तो बिहार और भाषा भोजपुरी से मेरा लगाव बचपन का है। क्‍योंकि कोलकाता में जहां मेरा घर है, वहां बिहार के लोग की संख्‍या काफी अधिक है। तो मेरी परवरिश में बंगाली संस्‍कार के साथ – साथ भोजपुरिया संस्‍कार भी है। इसलिए मुझे भोजपुरी इंडस्‍ट्री में काम करना अच्‍छा लगता है। दूसरी बात ये है कि भोजपुरी आज ग्‍लोबल लैंग्‍वेज है। कई देशों में भोजपुरी बोलने – समझने वाले लोग हैं। इसकी कनेक्टिविटी का जवाब नहीं। तो अपनी अभिनय कला को ज्‍यादा ये ज्‍यादा लोगों तक ले जाने के लिए भी मैंने इस इंडस्‍ट्री को चुना।

सवाल : आप प्रमोशन को बिहार आई हैं। कैसा लग रहा है?

जवाब : जैसा का मैंने पहले ही कहा कि बिहार से मेरा लगाव है तो यकीनन मुझे अच्‍छा लग रहा है। प्रमोशनल टूर को खूब इंज्‍वाय कर रही हूं। मैं अभी अपनी बेहतरीन फिल्‍म ‘जिला चंपारण’ प्रमोट करने बिहार आई हूं। इस दौरान कई जिलों में जब लोगों से मिली। उन्‍होंने फिल्‍म को शानदार रेस्पांस दिया है। हमारी उम्‍मीद से ज्‍यादा प्‍यार दिया है। कई लोगों ने तो यहां तक कहा कि वे ‘जिला चंपारण’ को एक बार और देखना चाहेंगे। इससे पता चलता है कि फिल्‍म की कनेक्टिविटी क्‍या है और फिल्‍म कैसी है।

सवाल : फिल्‍म में आपका किरदार क्‍या था और कितना चाइलेंजिग था सच आधारित किरदार को निभाना ?

जवाब : क्‍योंकि फिल्‍म ‘जिला चंपारण’ सच्‍ची घटना पर आधारित है, इसलिए खुद को अपने किरदार में हू-ब-हू ढलने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी। जो स्‍क्रीन पर दिख भी रहा है। फिल्‍म में मेरा किरदार पम्‍मी का है, जो बचपन से ही खेसारीलाल के प्‍यार में पागल रहती है। वो प्‍यार एकतरफा होता है, जिसका बाद में बलिदान करना होता है। इस तरह के किरदार को निभाना आसान नहीं होता है, लेकिन एक कलाकार के रूप में ऐसी भूमिका आपको और भी परिपक्‍व करती है। मैं मानती हूं कि एक सही कलाकार वही है, जो मुश्‍किल चुनौतियों का समाने करते हुए भी फिल्‍म में अपने किरदार को जीवंत बना दे।

सवाल : खेसारीलाल यादव के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा है?

जवाब : उनके साथ काम करना किसे अच्‍छा नहीं लगता है। हालांकि खेसारीलाल के साथ यह मेरी पहली फिल्‍म है। मगर उन्‍होंने कभी ये फील नहीं होने दिया। बल्कि उन्‍होंने कई बार तो एक गुरू की तरह मेरी मदद की। वे सभी की मदद करते हैं। रियल मायने में वे सुपर स्‍टार हैं। सेट पर वे अपने को-स्‍टार को मोटिवेट करते रहते हैं और उन्‍हें स्‍पेश देते हैं, ताकि सामने वाला सहज महसूस कर सके। मैं उनकी गायकी की भी कायल हूं। यही वजह है कि भोजपुरिया को-स्‍टार के साथ – साथ दर्शकों के भी चहेते हैं।

सवाल : ‘जिला चपारण’ के बाद आपकी कौन – कौन सी फिल्‍में आ रही हैं?

जवाब : फिल्‍म ‘जिला चपारण’ मेरे दिल के करीब है, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया है। इसके बाद मेरी एक फिल्‍म ‘राधे’ आ रही है, जिसमें इंडस्‍ट्री के मेगा स्‍टार रवि किशन और सुपर स्‍टार अरविंद अकेला कल्‍लू के साथ नजर आउंगी। फिर ‘दिल दिया है जान भी देंगे’ है, जिसकी शूट इसी महीने 27 अक्‍टूबर से होनी है। जिसमें मैं लीड रोल में हूं। इसकी भी कहानी काफी अच्‍छी है। इसके अलावा दो – तीन और फिल्‍में हैं, जिनकी अभी कास्टिंग बांकी है। इस वजह से मैं अभी उसका नाम लेना नहीं चाहूंगी।

सवाल : रवि किशन, खेसारीलाल यादव और अरविंद अकेला कल्‍लू कितने अलग हैं एक – दूसरे से?

जवाब : हर इंसान की अपनी पहचान होती है। उसी तरह भोजपुरी सिनेमा के इन दिग्‍गजों का भी अपना खास स्‍टाइल है। मगर तीनों में सबसे कॉमन बात जो मुझे लगती है, वो ये कि तीनों सहज, सरल और कॉपरेटिव मिजाज के बंदे हैं। बात रवि किशन की करें तो वो मेगा स्‍टार हैं। उन्‍हें भोजपुरी के अलावा अन्‍य कई भारतीय भाषाओं में फिल्‍मों का अनुभव है। उनकी अदाकारी को जोर नहीं। खेसारीलाल और कल्‍लू भोजपुरिया मिट्टी से आते हैं। दोनों गाने से तो लोगों के दिल पर राज करते ही हैं, शानदार अभिनय की भी मिशाल हैं। इनका एक दूसरे से कंपेरिजन बेइमानी होगी।

सवाल : अंत में, भोजपुरी और अश्‍लीलता। इस बारे में आपको क्‍या लगता है

जवाब : मैं तो बस इतना कहूंगी कि नजरिया गलत हो तो हर चीज फूहड़ लगती है। हालांकि अलबम वालों ने भोजपुरी में अश्‍लीलता को बढ़ाया है, मगर इसके बेस पर भोजपुरी सिनेमा को अश्‍लील बता देना गलत है। क्‍योंकि मुझे लगता है कि ये हर जगह है। हर इंडस्‍ट्री में है। मेरा मानना है कि जो चीज आपको अश्‍लील लगे, उसका खुल कर विरोध करिये। ताकि मेकर भी सोचें कि वे कहां गलती कर रहे हैं। मैं अपील करती हूं लोगों से कि वे ऐसे चीजों को नकारें। अगर फूहड़पन है तो मेकर और पब्लिक दोनों को मिलकर इसको खत्‍म करना होगा। इसलिए बिना देखें अश्‍लीलता का टैग देना मेरा हिसाब से गलत है।

नीचे दिए बटन को क्लिक करके इस पोस्ट को मित्रों में शेयर करें